जशपुर: मुख्यमंत्री ने ‘रेशम से रोशन जशपुर’ अभियान का किया शुभारंभ, टसर उत्पादन में जिला प्रदेश में अव्वल
जशपुरनगर: मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने मुख्यमंत्री कैम्प कार्यालय बगिया में रेशम विभाग, छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी पहल ‘रेशम से रोशन जशपुर’ का शुभारंभ किया। इस पहल का उद्देश्य जिले में टसर एवं मलबरी रेशम उत्पादन को बढ़ावा देकर किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए स्वरोजगार एवं आय के नए अवसर तैयार करना है।
इस अवसर पर कलेक्टर श्री रोहित व्यास, डीएफओ श्री शशी कुमार सहित रेशम विभाग एवं जिला प्रशासन के अधिकारी उपस्थित रहे।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि रेशम उत्पादन जशपुर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ किसानों और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जिले ने टसर कोसा उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। वर्ष 2025-26 में जशपुर जिला टसर कोसा उत्पादन में पूरे छत्तीसगढ़ में प्रथम स्थान पर रहा।
1,939 किसान रेशम उत्पादन से जुड़े
जिला रेशम विभाग के अनुसार जिले में 1,527.5 हेक्टेयर क्षेत्र में नवीन एवं विकसित पौधरोपण किया गया है। वर्तमान में जिले में 66 रेशम उत्पादन केंद्र और 84 कृमिपालन समूह सक्रिय हैं।
रेशम उत्पादन की गतिविधियों से जिले के कुल 1,939 कृमिपालन किसान जुड़े हुए हैं। इन किसानों को रेशम कीटपालन के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार और अतिरिक्त आय का अवसर मिल रहा है।
टसर कीटपालन से किसानों को 80 हजार से 1.20 लाख रुपये तक की आय
जशपुर में टसर कीटपालन ग्रामीण किसानों के लिए आय का महत्वपूर्ण जरिया बन रहा है। पालित प्रजाति के टसर कीटों के प्रमुख खाद्य पौधे साजा एवं अर्जुना हैं।
लगभग 45 से 55 दिनों के कीटपालन के बाद एक किसान को प्रति फसल औसतन 15 हजार नग टसर ककून प्राप्त होते हैं। शासन द्वारा उत्पादित ककून को ग्रेड के अनुसार निर्धारित दर पर ककून बैंक के माध्यम से खरीदा जाता है।
ककून की निर्धारित दर इस प्रकार है—
- ए ग्रेड: 5,000 रुपये प्रति हजार
- बी ग्रेड: 4,150 रुपये प्रति हजार
- सी ग्रेड: 3,000 रुपये प्रति हजार
इसके माध्यम से किसानों को प्रति फसल लगभग 80 हजार से 1.20 लाख रुपये तक की आय प्राप्त हो रही है।
किसानों को स्वस्थ डिम्ब समूह मात्र 2 रुपये प्रति समूह की रियायती दर पर उपलब्ध कराया जाता है। इसके साथ ही विभाग द्वारा निःशुल्क तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जाता है।
बीज उत्पादन से भी रोजगार के अवसर
टसर बीज उत्पादन योजना के तहत बीजागार निर्माण के लिए 47,500 रुपये तथा बीज कोसा क्रय के लिए 23,750 रुपये की चक्रीय राशि अनुदान के रूप में प्रदान की जा रही है।
एक बीज उत्पादक एक फसल में लगभग 3,000 से 4,000 स्वस्थ डिम्ब समूह तैयार कर सकता है। इनका विक्रय 10 रुपये प्रति समूह की दर से किया जा सकता है। इससे किसानों को रेशम उत्पादन के साथ बीज उत्पादन के माध्यम से भी अतिरिक्त आय का अवसर मिल रहा है।
मलबरी योजना से किसानों को अतिरिक्त आय
मलबरी यानी शहतूत आधारित रेशम उत्पादन को भी जिले में प्रोत्साहित किया जा रहा है। निजी भूमि पर शहतूत बगान विकसित करने के लिए शासन द्वारा 5 लाख रुपये तक का अनुदान दिया जा रहा है।
इसमें भवन निर्माण, पौधरोपण, सिंचाई और आवश्यक उपकरण शामिल हैं। पूर्ण विकसित शहतूत बगान से प्रति एकड़ लगभग 300 से 400 किलो उत्पादन प्राप्त होता है। इससे किसानों को करीब 80 हजार से 1 लाख रुपये वार्षिक आय के साथ अंतरफसल से अतिरिक्त लाभ भी मिल सकता है।
महिलाओं को धागाकरण और कताई से आत्मनिर्भर बनाने की पहल
रेशम उत्पादन को केवल कोसा उत्पादन तक सीमित न रखते हुए महिलाओं को भी इससे जोड़ने के लिए टसर धागाकरण एवं कताई योजना संचालित की जा रही है।
योजना के तहत महिलाओं को 12 हजार रुपये की रीलिंग मशीन और 9 हजार रुपये की स्पीनिंग मशीन शत-प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराई जाती है। इसके साथ ही एक माह का निःशुल्क प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
धागाकरण के माध्यम से 70 हजार से 1.20 लाख रुपये तथा कताई के माध्यम से 70 हजार से 1 लाख रुपये वार्षिक आय अर्जित की जा सकती है।
जिले में वर्तमान में 14 धागाकरण समूह कार्यरत हैं, जिन्होंने अब तक 15,925.811 किलोग्राम धागे का उत्पादन किया है।
1.21 करोड़ से अधिक कोसा फल का उत्पादन
वर्ष 2025-26 में जशपुर जिले में रेशम उत्पादन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की गई। जिले में कुल 1,21,65,649 नग कोसा फल का उत्पादन हुआ, जिसका बाजार मूल्य 72,84,820 रुपये बताया गया है।
इसी अवधि में 4,69,562 स्वस्थ डिम्ब समूह भी पालित किए गए।
रेशम उत्पादन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही नई दिशा
‘रेशम से रोशन जशपुर’ पहल के माध्यम से जिले में रेशम उत्पादन को संगठित रूप से बढ़ावा देने के साथ किसानों, महिलाओं और ग्रामीण परिवारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
टसर कीटपालन, बीज उत्पादन, मलबरी बगान, धागाकरण और कताई जैसी गतिविधियों के विस्तार से रेशम उत्पादन की पूरी श्रृंखला को मजबूत किया जा रहा है। इससे किसानों को केवल कच्चा उत्पाद बेचने के बजाय मूल्यवर्धित गतिविधियों से जुड़कर अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर भी मिल रहा है।
रेशम विभाग के अधिकारियों ने बताया कि जिले के इच्छुक किसान एवं ग्रामीण नजदीकी रेशम उत्पादन केंद्र में संपर्क कर संबंधित योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर लाभ ले सकते हैं।