कभी घर की चारदीवारी तक सीमित थीं लक्ष्मनिया दीदी, आज गांव में डिजिटल सेवाओं की बनीं पहचान
सूरजपुर। कभी घर की चारदीवारी तक सीमित जिंदगी जीने वाली सूरजपुर जिले के मसीरा गांव की श्रीमती लक्ष्मनिया दीदी ने आज आत्मनिर्भरता की ऐसी मिसाल कायम की है, जो ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपने लिए कोई अलग पहचान बनाने की कल्पना करने वाली लक्ष्मनिया दीदी आज न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, बल्कि गांव में डिजिटल सेवाओं की महत्वपूर्ण कड़ी बनकर ग्रामीणों को जरूरी सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं। अपनी मेहनत और शासन की योजनाओं से मिले अवसरों के बूते वे लखपति दीदी बन चुकी हैं।
लक्ष्मनिया दीदी की यह सफलता महिला सशक्तिकरण की उस तस्वीर को सामने लाती है, जिसमें अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों में भी प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में संचालित योजनाओं और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से मिले अवसरों ने उनके आत्मविश्वास को नई दिशा दी और उन्हें घर की सीमाओं से बाहर निकलकर आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला।
बैंक मित्र से बीसी सखी तक का सफर
वर्ष 2021 में लक्ष्मनिया दीदी ने बैंक मित्र के रूप में अपने कार्यजीवन की शुरुआत की। दो वर्षों तक बैंक मित्र के रूप में सेवाएं देने के बाद वर्ष 2023 में उन्होंने बीसी सखी की जिम्मेदारी संभाली। बैंकिंग सेवाओं को गांव के लोगों तक पहुंचाने के साथ-साथ उन्होंने क्लस्टर के माध्यम से वृक्षारोपण जैसे कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता निभाई।
इस दौरान धीरे-धीरे घर की सीमाओं से बाहर निकलकर काम करने का उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया। काम के साथ उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह भी मजबूत होती गई और उन्होंने अपने लिए एक अलग पहचान बनाई।
गांव में ही मिल रही हैं बैंकिंग और डिजिटल सेवाएं
आज लक्ष्मनिया दीदी का अपना सीएससी सेंटर है। उनके सेंटर के माध्यम से ग्रामीणों को गांव में ही नगद निकासी एवं जमा, खाता खोलने, एग्रीस्टैक, पीएम किसान, बिजली बिल भुगतान, मोबाइल रिचार्ज सहित विभिन्न बैंकिंग और डिजिटल सेवाएं उपलब्ध हो रही हैं।
पहले इन सेवाओं का लाभ लेने के लिए ग्रामीणों को भैयाथान या बसदेई जाना पड़ता था। अब लक्ष्मनिया दीदी के प्रयासों से ग्रामीणों को अपने गांव में ही जरूरी बैंकिंग और डिजिटल सुविधाएं मिल रही हैं। इससे ग्रामीणों के समय और आने-जाने के खर्च की भी बचत हो रही है और उन्हें स्थानीय स्तर पर ही आवश्यक सेवाएं मिल रही हैं।
शासन के सहयोग से पूरे किए अपने सपने
आत्मनिर्भरता ने लक्ष्मनिया दीदी को केवल आर्थिक मजबूती ही नहीं दी, बल्कि अपने सपनों को पूरा करने का आत्मविश्वास भी दिया। अपनी कमाई से उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक स्कूटी खरीदी और अपना पक्का मकान बनवाया। आर्थिक रूप से सक्षम होने के बाद उनके जीवन में सुविधाओं के साथ-साथ निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
बीसी सखी के रूप में आगे बढ़ने के लिए शासन से मिले सहयोग ने उनके आर्थिक सफर को मजबूती प्रदान की। उन्हें शून्य प्रतिशत ब्याज पर 60 हजार रुपये की सहायता मिली। इसके साथ ही बैंक लिंकेज और क्लस्टर के माध्यम से कम ब्याज दर पर प्राप्त ऋण ने उनकी आजीविका गतिविधियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बिहान से मिला आगे बढ़ने का अवसर
लक्ष्मनिया दीदी की कहानी इस बात का उदाहरण है कि शासन की योजनाओं से मिले अवसर ग्रामीण महिलाओं के जीवन में किस तरह सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। ‘बिहान’ से जुड़ने के बाद उन्हें अपने हुनर और मेहनत को आगे बढ़ाने का मंच मिला। बैंक मित्र से बीसी सखी और फिर गांव में डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराने तक का उनका सफर उनके बढ़ते आत्मविश्वास और आर्थिक सशक्तिकरण को दर्शाता है।
अपनी सफलता के बारे में लक्ष्मनिया दीदी कहती हैं, “कभी मेरा जीवन घर तक ही सीमित था। बिहान से जुड़ने के बाद मुझे आगे बढ़ने का अवसर मिला। शासन के सहयोग और मुख्यमंत्री विष्णु भैया की योजनाओं से आज मैं लखपति दीदी बन पाई हूं। इसके लिए मैं उनका हृदय से धन्यवाद देती हूं।”
लक्ष्मनिया दीदी की यह उपलब्धि ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने साबित किया है कि परिवार की जिम्मेदारियों के साथ अवसर मिलने पर महिलाएं आर्थिक गतिविधियों में आगे बढ़कर न केवल अपने परिवार की स्थिति मजबूत कर सकती हैं, बल्कि अपने गांव के लोगों को भी जरूरी सेवाएं उपलब्ध करा सकती हैं। आज उनकी आत्मनिर्भरता की कहानी महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास की एक प्रेरणादायक तस्वीर बनकर सामने आई है।