जहां कभी बंदूक थी, वहां बंधा रिश्तों का धागा: बस्तर में राखी ने बदली ‘दुश्मनी’ की परिभाषा
रायपुर। कलाई आगे बढ़ी तो कुछ पल के लिए जैसे समय ठहर गया। सामने सुरक्षा बल का जवान था और हाथ में राखी लिए खड़ी थी वह महिला, जिसकी जिंदगी के करीब 25 साल जंगल, नक्सली संगठन और संघर्ष के बीच बीते थे। कभी जिस वर्दी को देखकर मन में टकराव और अविश्वास पैदा होता था, उसी वर्दी की कलाई पर इस बार राखी बंधी। जवान ने भी बहन का रिश्ता स्वीकार किया, शगुन दिया और मिठाई खिलाई।
भानुप्रतापपुर के सुरक्षा बल कैंप में रक्षाबंधन का यह दृश्य बस्तर की बदलती तस्वीर की कहानी कह रहा था। यह सिर्फ राखी बांधने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि वर्षों के हिंसक संघर्ष से समाज और सुरक्षा बलों के बीच बनी दूरी को पाटने और विश्वास बहाली की एक मानवीय पहल थी।
हाथ में हथियार नहीं, राखी थी
करीब 25 वर्षों तक नक्सली संगठन का हिस्सा रहीं मीना और अन्य पूर्व नक्सली महिलाओं के लिए यह पल सामान्य नहीं था। जंगल की जिंदगी में हथियार और संघर्ष उनका अतीत रहे हैं, लेकिन अब वही हाथ एक नए रिश्ते और नई शुरुआत का संदेश दे रहे थे।
पूर्व नक्सली महिलाओं ने सुरक्षा बल के जवानों की कलाई पर राखी बांधी। जवानों ने भी उन्हें बहन के रूप में स्वीकार करते हुए शगुन दिया, मिठाई खिलाई और इस रिश्ते को सम्मान दिया। वर्षों तक गोलियों और बारूदी सुरंगों के साए में रहे बस्तर में यह दृश्य संवाद और विश्वास की एक नई तस्वीर बनकर सामने आया।
महिला पुलिसकर्मियों ने भी बढ़ाया भाईचारे का हाथ
आयोजन में महिला पुलिसकर्मियों ने भी हिस्सा लिया। कभी नक्सल हिंसा के खिलाफ अभियानों और सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा रहे जवान और मुख्यधारा में लौट चुकी पूर्व नक्सली महिलाएं इस दिन संघर्ष के दो पक्ष नहीं, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते में नजर आए।
इस आयोजन का संदेश था कि हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वालों को समाज में स्वीकार्यता मिले और सुरक्षा बलों के साथ विश्वास का रिश्ता बने, तो नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति की राह और मजबूत हो सकती है।
एसपी बोले—रिश्तों के धागे से सामान्य होंगे रिश्ते
कांकेर एसपी श्री निखिल राखेचा ने इस पहल को नक्सल समस्या के समाधान की दिशा में एक अनूठा प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद की समस्या के समाधान की दिशा में बढ़ाए जा रहे कदमों का यह रक्षाबंधन एक प्रतीक है और रिश्तों के इस धागे से आपसी संबंध सामान्य होंगे।
उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास केवल त्योहार मनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका उद्देश्य समाज में विश्वास बहाली को मजबूत करना और मुख्यधारा से जुड़ने की प्रक्रिया को गति देना भी है।
मीना के लिए राखी का मतलब सिर्फ त्योहार नहीं
करीब ढाई दशक तक नक्सली संगठन का हिस्सा रहने के बाद मुख्यधारा में लौटना आसान नहीं होता। जंगल की जिंदगी, संगठन की सोच और संघर्ष के बीच बीते वर्षों के बाद समाज के साथ नए सिरे से जुड़ना एक लंबी प्रक्रिया है।
ऐसे में राखी का यह धागा मीना और उनके साथ आई अन्य महिलाओं के लिए नए सामाजिक रिश्तों की शुरुआत जैसा था। जिस समाज और सुरक्षा व्यवस्था से कभी दूरी रही, उसी व्यवस्था के प्रतिनिधि जवान की कलाई पर राखी बांधना अतीत की कड़वाहट को पीछे छोड़कर नई जिंदगी की ओर बढ़ने का संकेत है।
बस्तर में बदल रही है कहानी
बस्तर की पहचान लंबे समय तक नक्सली हिंसा, मुठभेड़, शहीद जवानों और भय के इर्द-गिर्द रही है। बंदूक की मौजूदगी ने सामान्य जनजीवन और विकास की रफ्तार को भी प्रभावित किया। अब इसी बस्तर से बदलाव के नए अध्याय सामने आ रहे हैं।
हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटते लोग, गांवों तक पहुंचती विकास योजनाएं, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार तथा सामाजिक विश्वास बहाली के प्रयास इस बदलाव का हिस्सा बन रहे हैं। भानुप्रतापपुर का यह रक्षाबंधन उसी बदलाव की एक मानवीय तस्वीर है।
एक राखी, कई संदेश
राखी का धागा छोटा है, लेकिन इस आयोजन का संदेश बड़ा है। यह हिंसा का रास्ता छोड़कर लौटने वालों के लिए संदेश है कि वापसी का रास्ता खुला है। समाज के लिए संदेश है कि मुख्यधारा में लौटने वालों को स्वीकार करना जरूरी है। वहीं सुरक्षा बलों के लिए भी यह एक मानवीय पहल है कि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी के साथ विश्वास का रिश्ता भी मजबूत किया जा सकता है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र में यह आयोजन इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां राखी सिर्फ कलाई पर नहीं, बल्कि भरोसे के रिश्ते पर भी बंधी।
जहां कभी डर था, वहां अब भरोसे की कोशिश
छत्तीसगढ़ सरकार के नक्सल मुक्त बस्तर के संकल्प और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में शांति, विकास और विश्वास के साथ आगे बढ़ते बस्तर की यह तस्वीर बताती है कि किसी भी संघर्ष का अंत केवल बंदूक से नहीं होता। स्थायी शांति के लिए लोगों के बीच भरोसा लौटना भी उतना ही जरूरी है।
नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे प्रयासों और बस्तर में बदलते सामाजिक माहौल के बीच यह पहल एक भावुक और मानवीय तस्वीर पेश करती है। कैंप में राखी बंधने के बाद शायद सबसे बड़ा बदलाव यही था कि कुछ देर के लिए वहां किसी ने यह नहीं देखा कि सामने वाला कल कौन था।
देखा तो सिर्फ इतना गया कि आज सामने खड़ा व्यक्ति कौन है—एक भाई, एक बहन और एक ऐसे समाज का हिस्सा, जो अपने अतीत से आगे बढ़कर शांति की ओर जाना चाहता है।
बस्तर में कभी बंदूक रिश्तों के बीच खड़ी थी। इस रक्षाबंधन में उसी जगह एक धागा खड़ा था—रिश्तों का, भरोसे का और नए बस्तर का।