300 मीटर पहाड़ चढ़कर मिलती है इतिहास की झलक: जशपुर के जयमरगा गुफा में छिपे हैं हजारों साल पुराने शैलचित्र ,आदिम मानव जीवन के महत्वपूर्ण साक्ष्य

300 मीटर पहाड़ चढ़कर मिलती है इतिहास की झलक: जशपुर के जयमरगा गुफा में छिपे हैं हजारों साल पुराने शैलचित्र ,आदिम मानव जीवन के महत्वपूर्ण साक्ष्य

जशपुरनगर, 04 अप्रैल 2026। प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध जशपुर जिला अब अपने समृद्ध पुरातात्विक महत्व को लेकर भी चर्चा में है। जिले के मनोरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम जयमरगा स्थित गढ़पहाड़ की गुफा में प्रागैतिहासिक काल के आदिमकालीन शैलचित्र मिलने से यह क्षेत्र ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है। यह स्थल जशपुर जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

जयमरगा ग्राम, जो ग्राम पंचायत डड़गांव का आश्रित गांव है, अपनी प्राकृतिक बनावट और ऐतिहासिक धरोहर के लिए विशेष पहचान रखता है। लगभग 1400 की आबादी वाले इस गांव तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। गांव पहुंचने के बाद गढ़पहाड़ की लगभग 300 मीटर ऊंची चढ़ाई पार कर इस प्राचीन गुफा तक पहुंचा जाता है, जहां ये दुर्लभ शैलचित्र स्थित हैं।

गुफा में बने ये शैलचित्र इस बात के प्रमाण हैं कि प्रागैतिहासिक काल में आदिम मानव इस क्षेत्र में निवास करते थे। इन चित्रों में उस समय के जीवन, शिकार और सामाजिक गतिविधियों की झलक मिलती है। स्थानीय ग्रामीण इस गुफा को आस्था से भी जोड़ते हैं और यहां पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे यह स्थल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन गया है।

पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. अंशुमाला तिर्की और बालेश्वर कुमार बेसरा के अनुसार जयमरगा क्षेत्र प्रागैतिहासिक स्थलों से समृद्ध है। पहाड़, घने जंगल और समीप बहने वाले जल स्रोतों के कारण यह स्थान आदिम मानव के लिए उपयुक्त निवास स्थल रहा होगा। यहां भोजन, पानी और आश्रय की पर्याप्त उपलब्धता रही होगी, जिसके कारण मानव गतिविधियों के स्पष्ट साक्ष्य मिलते हैं।

गुफा में पाए गए शैलचित्रों में मानव आकृतियां, पशु आकृतियां, ज्यामितीय डिजाइन और कुछ रहस्यमयी आकृतियां भी देखने को मिलती हैं। ये चित्र मुख्य रूप से लाल और सफेद रंगों से बनाए गए हैं, जो उस समय प्राकृतिक खनिजों से तैयार किए जाते थे। यहां हेमाटाइट पत्थर की उपलब्धता भी पाई गई है, जिसका उपयोग रंग बनाने में किया जाता था।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह गुफा किसी पहरेदारी स्थल के रूप में भी उपयोग में लाई जाती रही होगी, जहां से आदिम मानव शिकार के लिए जंगली जानवरों पर नजर रखते थे। शैलचित्रों में बैल, तेंदुआ, हिरण जैसे पशुओं के साथ मानव आकृतियों का चित्रण उस समय के जीवन और पर्यावरण को दर्शाता है।

इसके अलावा इस स्थल पर माइक्रोलिथिक उपकरण जैसे लुनैट, स्क्रैपर, पॉइंट, ट्रैपेज, साइड स्क्रैपर और ब्लेड भी पाए गए हैं, जो मध्य पाषाण काल के माने जाते हैं। ये उपकरण शिकार, काटने और अन्य दैनिक कार्यों के लिए उपयोग में लाए जाते थे।

जयमरगा का यह गढ़पहाड़ न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी अपार संभावनाएं समेटे हुए है। यदि इस स्थल का संरक्षण और विकास किया जाए, तो यह क्षेत्र प्रदेश के प्रमुख पुरातात्विक पर्यटन स्थलों में अपनी अलग पहचान बना सकता है।